फोबिया के शिकार न बनें डॉक्टर

loktantranews: जिले में जिस तेजी से कोरोना संक्रमण का ग्राफ बढ़ रहा है। उसे देख कर अब ईलाज करने वाले डॉक्टर भी डरने लगे हैं। कई ऐसे मामले सामने आये हैं, जिनमें मरीजों ने अस्पताल के गेट पर तड़प कर दम तोड़ दिया, लेकिन डॉक्टर मरीज को देखने नहीं आये। साइकोलॉजी एंड मेंटल हेल्थ विभाग के विशेषज्ञों ने इस तरह की घटना को कोरोना फोबिया से जोड़ कर देख रहे हैं।

गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय में साइकोलॉजी एंड मेंटल हेल्थ विभाग के विभागाध्यक्ष डॉक्टर एपी सिंह ने बताया कि आए दिन अखबार व टीवी चैनल के माध्यम से इस तरह की मामले सुनने व देखने के लिए मिल रहे हैं, काफी देर तक अस्पताल में मरीज के तड़पते रहने के बाद भी डॉक्टर उसे देखने नहीं आये। मरीज को पहले स्टेज का उपचार भी नहीं दिया गया, जिससे उसकी मौत हो गई। यह कोरोना फोबिया है। उन्होंने बताया कि पिछले साल कोरोना से यहीं डॉक्टर जंग लड़ रहे थे। इतना संसाधन नहीं था, लेकिन मरीज की जान बचाने का जज्जा व कोरोना को हराने का हौंसला था। मरीजों के बीच घिरे रहने व आंखों के सामने तड़पते मरीज की मौत देख कर डॉक्टर विचलित होने लगे हैं।

एक मई की घटना को किया याद

उन्होंने याद दिलाते हुए कहा कि एक मई को दिल्ली के मैक्स अस्पताल के डॉक्टर विवेक राय ने घर में आत्महत्या कर ली थी। वह मानसिक रुप से परेशान हो चुके थे। रोज वह मरीजों को रोते-तड़पते देख रहे थे। इसे वह बर्दाश्त नहीं कर सकें। इसी तरह से नोएडा में भी संक्रमित पाये जाने पर एक डेंटल डॉक्टर व एक मरीज ने ऊंची इमारत से छलांग कर आत्महत्या कर ली थी। ऐसे मरीजों की काउंसलिंग की जरुरत होती है। डॉक्टरों पर लोगों की जान बचाने की जिम्मेदारी होती है। वह जान देने लगे तो मरीजों की जान कौन बचायेगा।

खुद को रखें व्यस्त

उन्होंने डॉक्टरों को सुझाव भी दिया है कि मरीजों के बीच घिर कर तनाव में न आयें। ऐसा होने पर धीमा म्यूजिक, भक्ति संगीत सुनें, किसी करीबी या नजदीकी मित्र से बात खुद को व्यस्त रखने का प्रयत्न करें, या प्रकृति और हरियाली के बीच थोड़ा वक्त बिताने का प्रयास करें। इससे तनाव दूर होगा।

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